“दुर्वासा की तपोभूमि से उठी शिक्षा की नई क्रांति… क्या बदल जाएगा आजमगढ़ का इतिहास
रिपोर्ट महेंद्र कुमार
आजमगढ़ जनपद के उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में, जिसे महर्षि दुर्वासा की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है। महर्षि दुर्वासा ने इसी पावन भूमि पर वर्षों तक तपस्या की थी। यह धरती केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ज्ञान, तप, संस्कृति और भारतीय परंपरा की अमूल्य धरोहर भी मानी जाती है।
कहा जाता है कि जहां ऋषियों ने ज्ञान की ज्योति जलाई थी, आज उसी भूमि पर शिक्षा की एक नई मशाल जलाने का प्रयास किया जा रहा है।
यह कहानी किसी राजनेता की नहीं… किसी सरकारी योजना की नहीं…
यह कहानी उस व्यक्ति की है जिसने गरीबी देखी… ईंट-भट्ठे पर मजदूरी की… संघर्षों के बीच अपना मुकाम बनाया… और फिर अपने गांव लौटकर बच्चों के भविष्य को बदलने का संकल्प लिया।
नाम है… राजमणि यादव।

अहिरौला ब्लॉक के गजरी गांव निवासी राजमणि यादव एक साधारण परिवार से हैं। माता-पिता के इकलौते पुत्र। बचपन अभावों में बीता। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि परिवार चलाने के लिए उन्हें ईंट-भट्ठे पर मजदूरी तक करनी पड़ी।
लेकिन कहते हैं कि कठिनाइयाँ इंसान को तोड़ती नहीं, उसे मजबूत बनाती हैं।
राजमणि यादव ने भी संघर्ष को अपनी ताकत बनाया। मेहनत की, लखनऊ पहुंचे और रियल एस्टेट के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। सफलता उनके कदम चूमने लगी, लेकिन उन्होंने कभी अपने गांव और अपना अतीत नहीं भुलाया।
रणतूर्य से विशेष बातचीत में राजमणि यादव बताते हैं कि गरीबी का दर्द वही समझ सकता है जिसने उसे जिया हो।

राजमणि यादव बताते हैं कि उनकी माता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। आर्थिक अभाव के कारण उन्हें समय पर बेहतर इलाज नहीं मिल सका और उनका निधन हो गया। मां को खोने का दर्द आज भी उनके दिल में जिंदा है।
इसी दर्द ने एक संकल्प को जन्म दिया।
उन्होंने अपनी स्वर्गीय माता की स्मृति में “माँ देवरती शिक्षण संस्थान” की स्थापना की।
उनका कहना है कि यह विद्यालय केवल ईंट और सीमेंट का भवन नहीं है, बल्कि उनकी मां के सपनों और गांव के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का मंदिर है।
राजमणि यादव की सोच केवल स्कूल खोलने तक सीमित नहीं है।
उनकी इच्छा है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों को निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
गरीब और अमीर का कोई भेदभाव न हो।
ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे भी आधुनिक सुविधाओं के बीच पढ़ें।
खेलकूद हो… अनुशासन हो… कंप्यूटर शिक्षा हो… और बच्चों के अंदर वह आत्मविश्वास हो, जिससे वे दुनिया के किसी भी मंच पर खड़े होकर कह सकें कि वे आजमगढ़ के एक गांव से निकले हैं।
राजमणि यादव कहते हैं कि उनका सपना है कि यहां से निकलने वाले बच्चे डॉक्टर बनें… इंजीनियर बनें… आईएएस बनें… वैज्ञानिक बनें… खिलाड़ी बनें… और देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपने जिले और प्रदेश का नाम रोशन करें।
बात केवल शिक्षा की नहीं है…
राजमणि यादव भविष्य की शिक्षा की बात करते हैं।
वह चीन और जापान जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहां बच्चों को बचपन से ही हुनर सिखाया जाता है।
इसी सोच के साथ वह चाहते हैं कि उनका विद्यालय भी सरकार के स्किल इंडिया मिशन की भावना के अनुरूप बच्चों को रोजगारपरक और कौशल आधारित शिक्षा दे।
ताकि गांव का बच्चा नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बने।
विद्यालय में हाईटेक शिक्षा, खेलकूद और आधुनिक संसाधनों की व्यवस्था का सपना भी इसी सोच का हिस्सा है।
आज जब अक्सर यह सवाल उठता है कि विकास केवल सरकारों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है, ऐसे समय में राजमणि यादव बिना किसी सरकारी पद और बिना किसी जनप्रतिनिधि बने अपने निजी संसाधनों से शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से समाज के लिए एक प्रेरक उदाहरण है।
उनका यह प्रयास बताता है कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति के संकल्प से भी हो सकती है।
राजमणि यादव के दो पुत्र हैं। एक चेन्नई में और दूसरा दिल्ली में रहकर पढ़ाई के साथ कारोबार की जिम्मेदारी संभाल रहा है। लेकिन राजमणि यादव की सबसे बड़ी पूंजी उनकी सोच है, जो आने वाली पीढ़ियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने का सपना देख रही है।
दुर्वासा की तपोभूमि से निकली यह शिक्षा की नई तपस्या आने वाले वर्षों में क्या रंग लाएगी, यह भविष्य बताएगा।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर समाज के सक्षम लोग अपने गांव और अपने क्षेत्र के लिए इसी तरह आगे आएं, तो शिक्षा की तस्वीर बदलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
आज गजरी गांव में खड़ा यह विद्यालय केवल एक इमारत नहीं है…
यह उन गरीब बच्चों की उम्मीद है…
जिनकी आंखों में बड़े सपने हैं…
और उन सपनों को उड़ान देने का प्रयास कर रहे हैं राजमणि यादव।





